विश्‍वासमुझे और सच्चाई के बारे में गैर-यहूदियो का शिक्षक ठहराया गया है।—1 तीमु. 2:7.

गलातियों 2:7-9)) 7 इसके बजाय, उन भाइयों ने देखा कि मुझे गैर-यहूदियों को खुशखबरी सुनाने के लिए ठहराया गया है, ठीक जैसे यहूदियों को खुशखबरी सुनाने के लिए पतरस को ठहराया गया था। 8 इसलिए कि जिसने पतरस को यहूदियों के लिए प्रेषित-पद की ज़िम्मेदारी निभाने की ताकत दी, उसी ने मुझे गैर-यहूदियों के लिए यह ज़िम्मेदारी निभाने की ताकत दी है। 9 उन्होंने यह भी समझ लिया कि किस तरह मुझ पर महा-कृपा की गयी। तब याकूब, कैफा और यूहन्‍ना ने जो मंडली के खंभे समझे जाते थे, मुझसे और बरनबास से अपना दायाँ हाथ मिलाकर जताया कि हम सब साझेदार हैं और हम दूसरी जातियों के पास जाएँ, जबकि वे यहूदियों के पास जाएँगे।

अपने भाइयों का हौसला बढ़ाने में प्रेषित पौलुस एक बेहतरीन मिसाल है। पवित्र शक्‍ति ने पौलुस को जिन लोगों के पास भेजा था, वे यूनानी, रोमी और गैर-यहूदी थे और कई देवी-देवताओं को पूजते थे।

((1 थिस्सलुनीकियों 2:14)) 14 भाइयो, तुम परमेश्‍वर की उन मंडलियों की मिसाल पर चले जो यहूदिया में मसीह यीशु के साथ एकता में हैं। क्योंकि तुमने अपने देश के लोगों के हाथों वैसा ही दुख झेला जैसा वे यहूदी लोगों के हाथों झेल रहे हैं। पौलुस ने यूनान, इटली और उस इलाके में प्रचार किया जो आज तुर्की के नाम से जाना जाता है। वहाँ उसने गैर-यहूदियों को खुशखबरी सुनायी और उन जगहों में मंडलियाँ शुरू कीं। इन नए मसीहियों के लिए ज़िंदगी आसान नहीं थी। मसीही बनने की वजह से उन्हें अपने ही देश के लोगों के हाथों ज़ुल्म सहने पड़े। इस वजह से उन्हें हौसला-अफज़ाई की ज़रूरत थी।

ईसवी सन्‌ 50 के आस-पास पौलुस ने चिट्ठी लिखकर थिस्सलुनीके की नयी मंडली की हिम्मत बढ़ायी। उसमें उसने कहा, ‘हम जब भी प्रार्थनाओं में तुम्हारा ज़िक्र करते हैं, तो हमेशा परमेश्‍वर का धन्यवाद करते हैं। हम हर वक्‍त तुम्हें याद करते हैं कि तुम कैसे विश्‍वासयोग्य रहकर सेवा करते हो, प्यार से कड़ी मेहनत करते हो और धीरज धरते हो।’

((1 थिस्सलुनीकियों 5:11)) 11 इसलिए एक-दूसरे का हौसला बढ़ाते रहो और एक-दूसरे को मज़बूत करते रहो, ठीक जैसा तुम कर भी रहे हो।


फिर उसने नए भाइयों को एक-दूसरे की हिम्मत बँधाने का बढ़ावा भी दिया। उसने लिखा, “एक-दूसरे का हौसला बढ़ाते रहो और एक-दूसरे को मज़बूत करते रहोरहो

((1 थिस्सलुनीकियों 1:2, 3)) 2 हम जब भी प्रार्थनाओं में तुम्हारा ज़िक्र करते हैं, तो हमेशा परमेश्‍वर का धन्यवाद करते हैं। 3 हम अपने पिता और परमेश्‍वर के सामने हर वक्‍त तुम्हें याद करते हैं कि तुम कैसे विश्‍वासयोग्य रहकर सेवा करते हो, प्यार से कड़ी मेहनत करते हो और हमारे प्रभु यीशु मसीह पर आशा रखने की वजह से धीरज धरते हो।

((प्रेषि. 8:14; 15:2)) जब यरूशलेम में प्रेषितों ने सुना कि सामरिया के लोगों ने परमेश्‍वर का वचन स्वीकार किया है, तो उन्होंने पतरस और यूहन्‍ना को उनके पास भेजा।मगर जब इस बात पर पौलुस और बरनबास के साथ उनकी काफी बहस हुई और झगड़ा हुआ, तो इस सिलसिले में पौलुस और बरनबास को साथ ही कुछ और भाइयों को, प्रेषितों और प्राचीनों के पास यरूशलेम भेजने का इंतज़ाम किया गया।

अपने भाइयों का हौसला बढ़ाने में प्रेषित पौलुस एक बेहतरीन मिसाल है। यीशु की मौत के कुछ ही समय बाद, ज़्यादातर प्रेषित यरूशलेम में ही रहे जहाँ शासी निकाय था।

((गला. 2:7-9; 1 तीमु. 2:7)). इसके बजाय, उन भाइयों ने देखा कि मुझे गैर-यहूदियों को खुशखबरी सुनाने के लिए ठहराया गया है, ठीक जैसे यहूदियों को खुशखबरी सुनाने के लिए पतरस को ठहराया गया था। 8 इसलिए कि जिसने पतरस को यहूदियों के लिए प्रेषित-पद की ज़िम्मेदारी निभाने की ताकत दी, उसी ने मुझे गैर-यहूदियों के लिए यह ज़िम्मेदारी निभाने की ताकत दी है। 9 उन्होंने यह भी समझ लिया कि किस तरह मुझ पर महा-कृपा की गयी।+ तब याकूब,+ कैफा* और यूहन्‍ना ने जो मंडली के खंभे समझे जाते थे, मुझसे और बरनबास से अपना दायाँ हाथ मिलाकर जताया कि हम सब साझेदार हैं और हम दूसरी जातियों के पास जाएँ, जबकि वे यहूदियों के पास जाएँगे।

यहूदिया के मसीहियों ने जिन लोगों को मसीह के बारे में प्रचार किया, वे पहले से एक ही परमेश्‍वर को मानते थे। लेकिन पवित्र शक्‍ति ने पौलुस को जिन लोगों के पास भेजा था, वे यूनानी, रोमी और गैर-यहूदी थे और कई देवी-देवताओं को पूजते थे।

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